राजवंशो में आप कदम्ब वंश, गंगवंश, काकतीय वंश, पालवंश, कश्मीर के राजवंश, सेनवंश, कामरूप का वर्मन वंश, गहड़वाल (राठोर) राजवंश, राजपूत राजवंशो की उत्पत्ति, गुर्जर प्रतिहार वंश, चाहमान या चौहान वंश, चंदेल वंश, कलचूरि वेदि राजवंश, सिसोदिया वंश के इतिहास की जानकारी आप नीचे देखेंगे.
सीमावर्ती राजवंश में कदम्ब वंश का इतिहास
कदम्ब वंश की स्थापना मयूर शर्मन ने की थी.
कदम्ब वंश की राजधानी वनवासी था.
सीमावर्ती राजवंश में गंगवंश का इतिहास
गंगवंश संस्थापक बज्रह्स्त पंचम था.
अभिलेखों के अनुसार गंगवंश के प्रथम शासक कोंकणी वर्मा था.
गंगो की प्रारम्भिक राजधानी कुवलाल कोलर थी, जो बाद में तलकाड हो गयी.
दत्तकसूत्र पर टीका लिखने वाला गंग शासक माधव प्रथम था.
सीमावर्ती राजवंश में काकतीय वंश का इतिहास
काकतीय वंश का संस्थापक बीटा प्रथम था, जिसने नलगोंडा हैदराबाद में के छोटे से राज्य का गठन किया, जिसकी राजधानी अमंकौड़ थी.
इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक गणपति था. रुद्र्मादेवी गणपति की बेटी थी. जिसकी रुद्रदेव महाराज का नाम ग्रहण किया, जिसने ३५ वर्ष तक शासन किया.
गणपति ने अपनी राजधानी वारगंल में स्थानांतरित कर ली थी.
इस राजवंश का अंतिम शासक प्रताप रूद्र १२९५-१३२३ था.
सीमावर्ती राजवंश में पालवंश का इतिहास
पालवंश का संस्थापक गोपाल ७५० ई था.
इस वंश की राजधानी मुंगेर थी.
गोपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था. इसने औद्न्तपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना की थी.
पालवंश के प्रमुख शासक थे – धर्मपाल, देवपाल, नारायणपाल, महिपाल, नयपाल, आदि.
पालवंश का सबसे महान शासक धर्मपाल था जिसने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी.
कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष पालवंश, गुर्जर प्रतिहार वंश और राष्ट्रकूट वंश के बीच हुआ. इसमें पालवंश की और से सर्वप्रथम धर्मपाल शामिल हुआ था.
ग्याहरवी सदी के गुजरती कवि सौड़ठल ने धर्मपाल को उत्तरापथ स्वामी की उपाधि से सम्बोधित किया है.
ओदंतपुरी बिहार के प्रसिद्ध बौद्धमठ का निर्माण देवपाल ने करवाया था.
जावा के शेलेन्द्रवंशी शासक बालपुत्र देव के अनुरोध पर देवपाल ने उसे नालंदा ने एक बौद्धविहार बनवाने के लिए ५ गाँव दान में दिए थे.
गौंडीरीति नामक साहित्यिक विद्या का विकास पाल शासको के समय में हुआ.
पाल शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे.
सीमावर्ती राजवंश में सेनवंश का इतिहास
सेनवंश की स्थापना सामंत सेन ने राढ़ में की थी.
इसकी राजधानी नदिया लखनौती थी.
सेनवंश के प्रमुख शासक विजयसेन, बल्लाल सेन और लक्ष्मण सेन थे.
सेनवंश का प्रथम स्वतंत्र शासक विजयसेन था, जो शैवधर्म का अनुयायी था.
दानसागर और अद्भुत सागर नामक ग्रन्थ की रचना सेन शासक बल्लासेन ने की थी. अद्भुत सागर को लक्ष्मण सेन ने पूर्णरूप दिया था.
लक्ष्मण सेन की राज्यसभा में गीतगोविन्द के लेखक जयदेव, पवनदूत के लेखक धोयी और ब्राह्मण सर्वस्व के लेखक हलायुद्ध रहते थे.
हलायुद्ध लक्ष्मण सेन का प्रधान न्यायाधीन और मुख्यमंत्री था.
विजयसेन ने देवपाड़ा में प्रघुगणेश्वर मंदिर (शिव की विशाल मंदिर) की स्थापना की.
सेन राजवंश प्रथम राजवंश था, जिसने अपना अभिलेख सर्वप्रथम हिंदी में उत्कीर्ण करवाया.
लक्ष्मणसेन बंगाल का अंतिम हिन्दू शासक था.
सीमावर्ती राजवंश में कश्मीर के राजवंश का इतिहास
कश्मीर पर शासन करनेवाले शासक वंश कालक्रम से इस प्रकार थे – कर्कोट वंश, उत्पल वंश, लोहार वंश.
सातवी शताब्दी में दुर्लभवर्न्दन नामक व्यक्ति ने कश्मीर में कर्कोट वंश की स्थापना की थी.
प्रतापपुर नगर की स्थापना दुरलभक ने की.
कर्कोट वंश का सबसे शक्तिशाली राजा ललितादित्य मुक्तापीड था.
कश्मीर का मार्तण्ड मंदिर का निर्माण ललितादित्य के द्वारा करवाया गया था.
कर्कोट वंश के बाद कश्मीर पर उत्पल वंश का शासन हुआ. इस वंश का संस्थापक अवंतिवर्मन था.
अवन्तिपुर नामक नगर की स्थापना अवंतिवर्मन ने की थी.
अवंतिवर्मन के अभियंता सुय्य ने सिचाई के लिए नहरों का निर्माण करवाया.
९८० ई में उत्पलवंश की रानी दिद्दा एक महत्वाकांक्षिणी शासिका हुई.
उत्पल वंश के बाद कश्मीर पर लोहारवंश का शासन हुआ.
लोहार वंश का संस्थापक संग्रामराज था.
संग्रामराज के बाद अनन्त राजा हुआ. इसकी पत्नी सुर्यमती ने प्रशासन को सुधारने में उसकी सहायता की.
लोहार वंश का शासक हर्ष विद्वान, कवि तथा कई भाषाओ का ज्ञाता था.
कल्हण हर्ष का आश्रित कवि था.
जयसिंह लोहार वंश का अंतिम शासक था, जिसने ११२८ ईसे ११५५ तक शासन किया. जयसिंह के शासन के साथ ही कल्हण की राजतरंगिणी का विवरण समाप्त हो जाता है.
सीमावर्ती राजवंश में कामरूप का वर्मन वंश का इतिहास
चौथी शताब्दी के मध्य कामरूप में वर्मनवंश का उदय हुआ, इस वंश की प्रतिष्ठा का संस्थापक पुष्यवर्मन था.
इसकी राजधानी प्रागज्योतिष नामक स्थान पर थी.
कालांतर में कामरूप पाल साम्राज्य का एक अंग बन गया.
सीमावर्ती राजवंश में राजपूत राजवंशो की उत्पत्ति का इतिहास
गुर्जर प्रतिहार वंश का इतिहास
इस वंश का संस्थापक नागभट्ट प्रथम था.
नागभट्ट प्रथम मालवा का शासक था.
नागभट्ट-II को राष्ट्रकूट सम्राट गोविन्द-III ने हराया था.
प्रतिहार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली और प्रतापी राजा मिहिरभोज था.
मिहिरभोज ने अपनी राजधानी कन्नोज में बनाई थी. वह विष्णुभक्त था, उसने विष्णु के सम्मान में आदि वाराह की उपाधि ग्रहण की.
राजशेखर प्रतिहार शासक महेन्द्रपाल के दरबार में रहते थे.
इस वंश का अंतिम राजा यशपाल १०३६ ई था.
दिल्ली नगर की स्थापना तोमर नरेश अंगनपाल ने ग्याहरवी सदी के मध्य में की.
सीमावर्ती राजवंश में गहड़वाल (राठोर) राजवंश का इतिहास
गहड़वाल वंश का संस्थापक चंद्रदेव था. इसकी राजधानी वाराणसी काशी थी.
इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा गोविन्द चन्द्र था.
गोविन्द चन्द्र का मंत्री लक्ष्मीघर शास्त्रों का प्रकाण्ड पंडित था, जिसने कृत्यकल्पतरु नामक ग्रन्थ लिखा था.
पृथ्वीराज-III ने स्वयंवर से जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर लिया था.
इस वंश का अंतिम शासक जयचंद्र था, जिसे गौरी ने ११९४ ई के चन्दावर युद्ध में मार डाला.
सीमावर्ती राजवंश में चाहमान या चौहान वंश का इतिहास
चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव था. इस वंश की प्रारम्भिक राजधानी अहिच्छत्र थी बाद में अजयराज द्वितीय ने अजमेर नगर की स्थापना की और उसे राजधानी बनाया.
इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अर्णोराज के पुत्र विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव ११५३ – ११६३ ई हुआ.
हरिकेलि नामक संस्कृत नाटक के रचयिता विग्रहराज IV था.
सोमदेव विग्रहराज-IV के राजकवि थे. इन्होने ललित विग्रहराज नामक नाटक लिखा.
अढाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद शुरू में विग्रहराज-IV द्वारा निर्मित एक विद्यालय था.
पृथ्वीराज-III इस वंश का अंतिम शासक था.
चंदवरदाई पृथ्वीराज तृतीय का राजकवि था, जिसकी रचना पृथ्वीराजरासो है.
रणथम्भौर के जैन मंदिर का शिखर पृथ्वीराज तृतीय ने बनवाया था.
तराईन का प्रथम युद्ध ११९१ ई में हुआ, जिसमे पृथ्वीराज तृतीय की विजय और गौरी की हार हुई.
तराईन के द्वितीय युद्ध ११९२ ई में हुआ, जिसमे गौरी की विजय और पृथ्वीराज तृतीय की हार हुई.
सीमावर्ती राजवंश में परमार वंश का इतिहास
परमार वंश का संस्थापक उपेन्द्रराज था. इसकी राजधानी धारा नगरी थी. प्राचीन राजधानी उज्जैन.
परमार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक राजा भौज था.
राजा भोज ने भोपाल के दक्षिण में भौजपुर नामक झील का निर्माण करवाया.
नैषधीयचरित के रचनाकार श्रीहर्ष थे.
राजाभोज ने चिकित्सा, गणित और व्याकरण पर अनेक ग्रन्थ लिखे. भोजकृत युक्ति कल्पतरु में वास्तुशास्त्र के साथ-साथ विविध वैज्ञानिक यंत्रो व उनके उपयोग का उल्लेख है.
नवसाहसांडक चरित के रचयिता पदम् गुप्त, दशरूपक के रचियता धनंजय, धनिक, हलायुध.
कविराज की उपाधि से विभूषित शासक था. राजा भोज
भोज ने अपनी राजधानी में सरस्वती मंदिर का निर्माण करवाया था.
इस मंदिर के परिसर में संस्कृत विद्यालय भी खोला गया था.
राजा भोज के शासनकाल में धारा नगरी विद्या और विद्वानों का प्रमुख केंद्र थी.
भोज ने चित्तौड में त्रिभुवन नारायण मंदिर का निर्माण करवाया.
भोजपुर नगर की स्थापना राजा भोज ने की थी.
परमार वंश के बाद तोमर वंश का, उसके बाद चाहमान वंश का और अंततः १२९७ ई में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नसरत खा और उलुग ख ने मालवा पर अधिकार कर लिया.
सीमावर्ती राजवंश में चंदेल वंश का इतिहास
प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद बुन्देल खंड की भूमि पर चंदेल का स्वतंत्र राजनितिक इतिहास प्रारम्भ हुआ.
बुंदेलखंड का प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति है.
चंदेल वंश का संस्थापक है – नन्नुक ८३१ ई.
इसकी राजधानी खजुराहो थी. प्रारम्भ में इसकी राजधानी कर्लिजर (महोबा) थी.
राजा धंग ने अपनी राजधानी कार्लिजर से खजुराहो में स्थानांतरित की थी.
चंदेल वंश का प्रथम स्वतन्त्र और सबसे प्रतापी राजा यशोवर्मन था.
यशोवर्मन ने कन्नोज पर आक्रमण कर प्रतिहार राजा देवपाल को हराया तथा उसे एक विष्णु की प्रतिमा प्राप्त की, जिसे उसने खजुराहो के विष्णु मंदिर में स्थापित की.
धंग ने जिन्ननाथ, विश्वनाथ और वैधनाथ मंदिर का निर्माण करवाया.
धंग ने गंगा यमुना के पवित्र संगम में शिव की आराधना करते हुए अपने शरीर का त्याग किया.
चंदेल शासक विद्याधर ने कन्नोज के प्रतिहार शासक राज्यपाल की हत्या कर दी. क्योकि उसने महमूद के आक्रमण का सामना किये बिना ही आत्मसमर्पण कर दिया था.
विद्याधर ही अकेला ऐसा भारतीय नरेश था जिसने महमूद गजनी की महत्वाकांक्षाओ का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया.
चंदेल शासक कीर्तिवर्मन की राज्यसभा में रहने वाले कृष्ण मिश्र ने प्रबोध चन्द्रोदय की रचना की थी.
कीर्तिवर्मन ने महोबा के समीप कीर्तिसागर नामक जलाशय का निर्माण किया.
आल्हा उदल नामक दो सेनानायक परमदिर्देव के दरबार में रहते थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध करते हुए अपनी जान गवांई थी.
चंदेल वंश का अंतिम शासक परमदिर्देव ने १२०२ ई में कुतुबुद्दीन ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली. इस पर उसके मंत्री अजयदेव ने उसकी हत्या कर दी.
सीमावर्ती राजवंश में सौलंकी वंश गुजरात के चालुक्य शासक का प्राचीन इतिहास
सोलंकी वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था.
इसकी राजधानी अन्हिलवाड थी.
मूलराज प्रथम शैवधर्म का अनुयायी था.
भीम प्रथम के शासनकाल में महमूद गजनी ने सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण किया.
भीम प्रथम के सामंत बिमल ने आबू पर्वत पर दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मंदिर बनवाया.
सोलंकी वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक जयसिंह सिद्धराज था.
प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचन्द्र जयसिंह सिद्धराज के दरबार में था.
माउंट आबू पर्वत राजस्थान पर एक मंडप बनाकर जयसिंह सिद्धराज ने अपने सातों पूर्वजो की गजारोही मूर्तियों की स्थापना की.
मोढेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण सोलंकी राजाओं के शासनकाल में हुआ था.
सिद्धपुर में रूद्रमहाकाल के मंदिर का निर्माण जयसिंह सिद्धराज ने किया था.
सोलंकी शासक कुमारपाल जैन मतानुयायी था. वह जैन धर्म के अंतिम राजकीय प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध है.
सोलंकी वंश का अंतिम शासक भीम द्वितीय था.
भीम – II के एक सामंत लवण प्रसाद ने गुजरात में बघेल वंश की स्थापना की थी.
बघेल वंश का कर्ण-II गुजरात का अंतिम हिन्दू शासक था, इसने अल्लुदीन खिलजी की सेनाओ का मुकाबला किया था.
सीमावर्ती राजवंश में कलचूरि वेदि राजवंश का इतिहास
कलचूरि वंश का संस्थापक कोक्कल था. इसकी राजधानी त्रिपुरी थी.
कलचूरि वंश का एक शक्तिशाली शासक गांगेय देव था, जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की, पूर्व मध्यकाल में स्वर्ण सिक्को के विलुप्त हो जाने के पश्च्यात इन्होने सर्वप्रथम इसे प्रारम्भ करवाया.
कलचूरि वंश का सबसे महान शासक कर्णदेव था, जिसने कलिंग पर विजय प्राप्त की और त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण की.
प्रसिद्ध कवि राजशेखर कलचूरि दरबार में ही रहते थे.
सीमावर्ती राजवंश में सिसोदिया वंश का इतिहास
सिसोदिया वंश के शासक अपने को सूर्यवंशी कहते थे.
सिसोदिया वंश के शासक मेवाड़ पर शासन करते थे. मेवाड़ की राजधानी चित्तौड थी.
अपनी विजयों के उपलक्ष्य में विजय स्तम्भ का निर्माण राणा कुम्भा ने चित्तौड में करवाया.
खतोली का युद्ध १५८१ ई में राणा सांगा और इब्राहिम लोदी के बीच हुआ.
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