Saturday, 20 January 2018

भारत में यूरोपिय व्यापारिक कंपनियों का आगमन

भारत में यूरोप से विदेशियों का आगमल प्राचीन काल से ही हो रहा था। यहाँ की व्यापारिक सम्पदा से आकर्षित होकर समय-समय पर अनेक यूरोपीय जातियों का आगमन होता रहा। 15वीं शताब्दी में हुई भौगोलिक खोजों ने संसार के विभिन्न देशों में आपसी सम्पर्क स्थापित कर लिया। इसी प्रयास के अन्तर्गत कोलम्बस स्पेन से भारत के समुद्री मार्ग की खोज में निकला और चलकर अमेरिका पहुँच गया। 'बार्थोलेम्यू डायज' 1487 ई. में 'आशा अन्तरीप' पहुँचा। 17 मई, 1498 को वास्कोडिगामा ने भारत के पश्चिमी तट पर स्थित बन्दरगाह कालीकट पहुँच कर भारत के नये समुद्र मार्ग की खोज की। कालीकट के तत्कालीन शासक जमोरिन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया। जमोरिन का यह व्यापार उस समय भारतीय व्यापार पर अधिकार जमाये हुए अरब के व्यापारियों को पसन्द नहीं आया।

पुर्तग़ालियों का आगमन

आधुनिक काल में भारत आने वाले यूरोपीय के रूप के पुर्तग़ाली सर्वप्रथम रहे। पोप अलेक्जेण्डर षष्ठ ने एक आज्ञा पत्र द्वारा पूर्वी समुद्रों में पुर्तग़ालियों को व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान कर दिया। प्रथम पुर्तग़ीज तथा प्रथम यूरोपीय यात्री वास्कोडिगामा 90 दिन की समुद्री यात्रा के बाद 'अब्दुल मनीक' नामक गुजरात के पथ प्रदर्शक की सहायता से 1498 ई. में कालीकट (भारत) के समुद्री तट पर उतरा।
वास्कोडिगामा के भारत आगमन से पुर्तग़ालियों एवं भारत के मध्य व्यापार के क्षेत्र में एक नये युग का शुभारम्भ हुआ। वास्कोडिगामा के भारत आने से और भी पुर्तग़ालियों का भारत आने का क्रम जारी हो गया। पुर्तग़ालियों के भारत आने के दो प्रमुख उद्देश्य थे-
  1. अरबों और वेनिस के व्यापारियों का भारत से प्रभाव समाप्त करना।
  2. भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना।

दुर्ग की स्थापना

9 मार्च, 1500 को 13 जहाज़ों के एक बेड़े का नायक बनकर 'पेड्रों अल्वारेज केब्राल' जलमार्ग द्वारा लिस्बन से भारत के लिए रवाना हुआ। वास्कोडिगामा के बाद भारत आने वाला यह दूसरा पुर्तग़ाली यात्री था। पुर्तग़ाली व्यापारियों ने भारत में कालीकटगोवादमनदीव एवं हुगली के बंदरगाहों में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कीं। पूर्वी जगत् के काली मिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से पुर्तग़ालियों ने 1503 ई. में कोचीन (भारत) में अपने पहले दुर्ग की स्थापना की।
1505 ई. में 'फ़्राँसिस्कों द अल्मेड़ा' भारत में प्रथम पुर्तग़ाली वायसराय बन कर आया। उसने सामुद्रिक नीति[1] को अधिक महत्व दिया तथा हिन्द महासागर में पुर्तग़ालियों की स्थिति को मजबूत करने का प्रयत्न किया। 1509 में अल्मेड़ा ने मिस्र, तुर्की और गुजरात की संयुक्त सेना को पराजित कर दीव पर अधिकार कर लिया। इस सफलता के बाद हिन्द महासागर पुर्तग़ाली सागर के रूप में परिवर्तित हो गया। अल्मेड़ा 1509 ई. तक भारत में रहा।
Blockquote-open.gif भारत में गोधिक स्थापत्य कला का आगमन पुर्तग़ालियों के साथ ही प्रारम्भ हुआ। पुर्तग़ालियों ने गोवादमन और दीव पर 1661 ई. तक शासन किया। उनके आगमन से भारतमें तम्बाकू की खेती, जहाज़ निर्माण तथा प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत हुई। इस प्रकार भारत में प्रथम प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना 1556 ई. में गोवामें हुई, जिसका श्रेय सिर्फ़ पुर्तग़ालियों को है। Blockquote-close.gif

राज्य विस्तार

अल्मेड़ा के बाद अलफ़ांसों द अल्बुकर्क 1509 ई. में पुर्तग़ालियों का वायसराय बनकर भारत आया। इसे भारत में पुर्तग़ाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। यह भारत में दूसरा पुर्तग़ाली गर्वनर था। उसने कोचीन को अपना मुख्यालय बनाया। अल्बुकर्क के गोवा का अधिकार करने से पूर्व एक 'तिमैथा' नामक हिन्दू ने अल्बुकर्क को अत्यंत महत्त्वपूर्ण सलाह देकर प्रोत्साहित किया था, जिसके बाद 1510 ई. में उसने बीजापुर के शासक यूसुफ़ आदिलशाह से गोवा को छीन कर अपने अधिकार में कर लिया। गोवा के अलावा अल्बुकर्क ने 1511 में मलक्का (दक्षिण पूर्व एशिया) और 1515 में फ़ारस की खाड़ी में स्थित हरमुज पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार दमन और दीव, सालसेट, बसीन, चोल, मुम्बईहुगली तथा सेन्ट थोमे पर पुर्तग़ालियों का अधिकार हो गया। पुर्तग़ालियों की आबादी को बढ़ाने के उद्देश्य से अलफ़ांसों द अल्बुकर्क ने भारतीय स्त्रियों से विवाह को प्रोत्साहन दिया। उसने अपनी सेना में भारतीयों को भर्ती किया। 1515 में अलबुकर्क की मृत्यु हो गई। उसे गोवा में दफ़ना दिया गया।
अल्बुकर्क के बाद नीनो-डी-कुन्हा अगला पुर्तग़ीज गर्वनर बनकर भारत आया। 1530 में उसने अपना कार्यालय कोचीन से गोवा स्थानान्तित किया और गोवा को पुर्तग़ाल राज्य की औपचारिक राजधानी बनाया। कुन्हा ने 'सैन्थोमी' (चेन्नई), 'हुगली' (बंगाल) तथा 'दीव' (काठमाण्डू) मे पुर्तग़ीज बस्तियों को स्थापित कर भारत में पूर्वी समुद्र तट की ओर पुर्तग़ाली वाणिज्य का विस्तार किया। उसने 1534 ई. में बसीन और 1535 में दीव पर अधिकार किया। नीनो-डी-कुन्हा के बाद जोवा-डी-कैस्ट्रों भारत का अगला पुर्तग़ाली गर्वनर नियुक्त हुआ। 1518 ई. में पुर्तग़ालियों ने कोलम्बा में और फिर मलक्का में कारखानों की स्थापना की। गोवा को पुर्तग़ालियों ने अपनी सत्ता और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित किया। 1559 ई. तक पुर्तग़ालियों ने गोवा, दमन, दीव, सालसेट, बसीन, चैल, मुम्बई, सान्थोमी और हुगली पर अपना अधिकार कर लिया। पुर्तग़ाली पड़ोसी राज्यों में भारतीयों को ही राजदूत और जासूस बनाकर भेजते थे।
Seealso.jpg इन्हें भी देखेंअल्बुकर्क एवं नीनो-डी-कुन्हा
तुर्की आक्रमण
वर्षआक्रांतास्थान
1529 ई.सुलेमान रईसगुजरात तट पर
1538 ई.सुलेमान पाशादीव पर
1551 ई.पेरी रईसमस्कट एवं भुज पर
1554 ई.अली रईसपश्चिमी समुद्र तट पर

डचों तथा अंग्रेज़ों का प्रभाव

अपनी शक्ति के विस्तार के साथ ही पुर्तग़ालियों ने भारतीय राजनीति में भी हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर लिया। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि वे कालीकट के राजा से, जिसकी समृद्धि अरब सौदागरों पर निर्भर थी, शत्रुता रखने लगे। वे कालीकट के राजा के शत्रुओं से, जिनमें कोचीन का राजा प्रमुख था, संधियाँ करने लगे। भारत में पुर्तग़ालियों ने सबसे पहले प्रवेश किया, लेकिन अठाहरवी सदी तक आते-आते भारतीय व्यापार के क्षेत्र में उनका प्रभाव जाता रहा। उनके पतन के महत्त्वपूर्ण कारणों में उनकी धार्मिक असहिष्णुता की नीति, अल्बुकर्क के अयोग्य उत्तराधिकारी, डच तथा अंग्रेज़ शक्तियों का विरोध, बर्बरतापूर्वक समुद्री लूटमार की नीति का पालन, स्पेन द्वारा पुर्तग़ाल की स्वतन्त्रता का हरण, विजयनगर साम्राज्य का विध्वंस आदि को गिनाया जाता हे। उनकी धार्मिक असहिष्णुता की नीति से भारतीय शक्तियाँ रुष्ट हो गयीं। जिन पर पुर्तग़ाली विजय नहीं प्राप्त कर सके। पुर्तग़ालियों को चुपके-चुपके व्यापार करना अन्त में उन्हीं के लिए घातक सिद्ध हुआ। ब्राजील का पता लग जाने पर पुर्तग़ाल की उपनिवेश संबंधी क्रियाशीलता पश्चिम की ओर उन्मुख हो गयी। अंततः उनके पीछे आने वाली यूरोपीय कंपनियों से उनकी प्रतिद्वंदिता हुई, जिसमें वे पिछड़ गये। अधिकांश भाग उनके हाथ से निकल गए।

पुर्तग़ालियों का पतन

डच और ब्रिटिश कम्पनियों के हिन्द महासागर में आ जाने से पुर्तग़ालियों का पतन होने लगा और उनका एकाधिकार समाप्त हो गया। 1538 ई. में अदन पर तुर्की का अधिकार हो गया। 1602 ई. में डचों ने वाण्टम के समीप पुर्तग़ाली बेड़े पर आक्रमण कर उसे पराजित कर दिया। 1641 ई. में डचों ने पुर्तग़ालियों के महत्त्वपूर्ण मलक्का दुर्ग को जीत लिया। 1628 ई. में फ़ारस की सेना की सहायता से अंग्रेज़ों ने हरमुज पर क़ब्ज़ा कर लिया तथा मराठों ने 1739 ई. में सालसेट और बसीन पर अधिकार कर लिया। 1661 ई. तक केवल गोवादमन और दीव ही पुर्तग़ालियों के अधिकार में रह गया।
हिन्द महासागर और दक्षिणी तट पर पुर्तग़ालियों के प्रभुत्व के लिए निम्नलिखित दो कारण जिम्मेदार थे-
  1. एशियाई जहाज़ों की तुलना में पुर्तग़ाली नौसेना का अधिक होना।
  2. सामजिक एवं व्यापारिक दृष्टिकोण से स्थापित महत्त्वपूर्ण व्यापारिक बस्तियों तथा स्थानीय लोगों का सहयोग प्राप्त करना।
Blockquote-open.gif अंग्रेज़ों ने 1639 ई. में मद्रास में तथा 1651 ई. में हुगली में व्यापारिक कोठियों की स्थापना की। 1661 ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तग़ाल की राजकुमारी 'कैथरीन' से हुआ तथा चार्ल्स को बम्बई दहेज के रूप में प्राप्त हुआ, जिसे उसने 1668 में दस पौण्ड वार्षिक किराये पर ईस्ट इण्डिया कम्पनीको दे दिया। पूर्वी भारत में अंग्रेज़ों ने अपना पहला कारखाना उड़ीसा में 1633 ई. में खोला। शीघ्र ही अंग्रेज़ों ने बंगालबिहारपटना, बालासोर एवं ढाका में अपने कारखाने खोले। Blockquote-close.gif

सामुद्रिक साम्राज्य

पुर्तग़ाली सामुद्रिक साम्राज्य को एस्तादो द इण्डिया नाम दिया गया। पुर्तग़ालियों ने हिन्द महासागर में होने वाले व्यापार को नियन्त्रित करने का प्रयास किया। उन्होंने 'काटर्ज-आर्मेडा-काफिला' व्यवस्था द्वारा एशियाई व्यापार पर गहरा प्रभाव डाला। पुर्तग़ालियों द्वारा अपने प्रभुत्व के अधीन सामुद्रिक मार्गों पर 'सुरक्षा कर' वसूल करने को 'काटर्ज व्यवस्था' कहा जाता था। पुर्तग़ालअधिग्रहीत क्षेत्रों में व्यापार के लिए मुग़ल बादशाह अकबर को भी एक निःशुल्क काटर्ज प्राप्त करना पड़ता था। पुर्तग़ाली अपने को 'सागर स्वामी' कहते थे। कोई भी भारतीय, अरबी जहाज़ पुर्तग़ाली अधिकारियों से 'काटर्ज' (परमिट) लिए बिना अरब सागर में नहीं जा सकता था। 1595 ई. तक पुर्तग़ालियों का हिन्द महासागर पर एकधिकार बना रहा।

ईसाई धर्म का प्रचार

1542 ई. में पुर्तग़ाली गर्वनर अल्फ़ांसों डिसूजा के साथ प्रसिद्ध जेसुइट पादरी और संत 'जेवियर' भारत आया। पुर्तग़ालियों ने कन्याकुमारी एवं एडमब्रिज के मध्य रहने वाले जनजातीय मछुवारे और मालाबार तट के मुकुवा मछुवारों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया। पुर्तग़ाल में 1560 ई. में गोवा में ईसाई धर्म न्यायालय की स्थापना की। मुग़ल शासक शाहजहाँ ने 1632 ई. में पुर्तग़ालियों से हुगली छीन लिया, क्योंकि पुर्तग़ाली वहाँ पर लूटमार, ईसाई धर्म का अनैतिक तरीके से प्रचार तथा धर्म परिवर्तन आदि निन्दनीय कार्य कर रहे थे। शाहजहाँ ने इसका दायित्व गर्वनर (सूबेदार) कासिम अली ख़ाँ को सौंपा था। पुर्तग़ाली मालाबार और कोंकण तट से सर्वाधिक काली मिर्च का निर्यात करते थे। मालाबर तट से अदरख, दालचीनीचंदनहल्दीनील आदि का निर्यात होता था।

विशेष योगदान

भारत में गोधिक स्थापत्य कला का आगमन पुर्तग़ालियों के साथ हुआ। पुर्तग़ालियों ने गोवा, दमन और दीव पर 1661 ई. तक शासन किया। उनके आगमन से भारत में तम्बाकू की खेती, जहाज़ निर्माण तथा प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत हुई। इस प्रकार भारत में प्रथम प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना 1556 ई. में गोवा में हुई।

अंग्रेज़ों का आगमन

इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम के समय में 31 दिसम्बर, 1600 को भारत में 'दि गर्वनर एण्ड कम्पनी ऑफ लन्दल ट्रेडिंग इन टू दि ईस्ट इंडीज' अर्थात् 'ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी' की स्थापना हुई। इस कम्पनी की स्थापना से पूर्व महारानी एलिजाबेथ ने पूर्व देशों से व्यापार करने के लिए चार्टर तथा एकाधिकार प्रदान किया। प्रारम्भ में यह अधिकार मात्र 15 वर्ष के लिए मिला था, किन्तु कालान्तर में इसे 20-20 वर्षों के लिए बढ़ाया जाने लगा। ईस्ट इंडिया कम्पनी में उस समय कुल क़रीब 217 साझीदार थे। कम्पनी का आरम्भिक उद्देश्य भू-भाग नहीं बल्कि व्यापार था।

हॉकिन्स और जहाँगीर की भेंट

भारत में व्यापारिक कोठियाँ खोलने के प्रयास के अन्तर्गत ही ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम ने 1608 ई. में कैप्टन विलियम हॉकिन्स को अपने राजदूत के रूप में मुग़ल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा। 1609 ई. में हॉकिन्स ने जहाँगीर से मिलकर सूरत में बसने की इजाजत मांगी, परन्तु पुर्तग़ालियों तथा सूरत के सौदागरों के विद्रोह के कारण उसे स्वीकृति नहीं मिली। हांकिन्स फ़ारसी भाषा का बहुत अच्छा जानकार था। कैप्टन हॉकिन्स तीन वर्षों तक आगरा में रहा। जहाँगीर ने उससे प्रसन्न होकर 400 का मनसब तथा जागीर प्रदान कर दी। 1616 ई. में सम्राट जेम्स प्रथम ने सर टॉमस रो को अपना राजदूत बना कर जहाँगीर के पास भेजा। टॉमस रो का एकमात्र उदेश्य था- 'व्यापारिक संधि करना'। यद्यपि उसका जहाँगीर से व्यापारिक समझौता नहीं हो सका, फिर भी उसे गुजरात के तत्कालीन सूबेदार "ख़ुर्रम" (शहजादा शाहजहाँ) से व्यापारिक कोठियों को खोलने के लिए फ़रमान प्राप्त हो गया।

व्यापारिक कोठियों की स्थापना

टॉमस रो के भारत से वापस जाने से पूर्व सूरत, आगरा, अहमदाबाद और भड़ौच में अंग्रेज़ों ने अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कर लीं। 1611 ई. में दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट पर सर्वप्रथम अंग्रेज़ों ने मसुलीपट्टम में व्यापारिक कोठी की स्थापना की। यहाँ से वस्त्र का निर्यात होता था। 1632 ई. में गोलकुण्डा के सुल्तान ने एक सुनहरा फरमान जारी कर दिया, जिसके अनुसार 500 पगोड़ा सालाना कर देकर गोलकुण्डा राज्य के बन्दरगाहों से व्यापार करने की अनुमति मिल गयी। 1639 ई. में मद्रास में तथा 1651 ई. में हुगली में व्यापारिक कोठियाँ खोली गईं। 1661 ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तग़ाल की राजकुमारी कैथरीन से हुआ तथा चार्ल्स को बम्बई दहेज के रूप में प्राप्त हुआ, जिसे उन्होंने 1668 में दस पौण्ड वार्षिक किराये पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया। पूर्वी भारत में अंग्रेज़ों ने अपना पहला कारखाना उड़ीसा में 1633 ई. में खोला। शीघ्र ही अंग्रेज़ों ने बंगालबिहारपटना, बालासोर एवं ढाका में अपने कारखाने खोले। 1639 ई. में अंग्रेज़ों ने चंद्रगिरि के राजा से मद्रास को पट्टे पर लेकर कारखाने की स्थापना की तथा कारखाने की क़िलेबन्दी कर उसे 'फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज' का नाम दिया। फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज शीघ्र ही कोरोमण्डल समुद्र तट पर अंग्रेज़़ी बस्तियों के मुख्यालय के रूप में मसुलीपट्टम से आगे निकल गया।

बंगाल में अंग्रेज़ी व्यापार

1651 ई. में बंगाल में सर्वप्रथम अंग्रेज़ों को व्यापारिक छूट प्राप्त हुई, जब ग्रेवियन वांटन, जो बंगाल के सूबेदार शाहशुजा के साथ दरबारी चिकित्सक के रूप में रहता था, कम्पनी के लिए एक फरमान प्राप्त करने में सफल हुआ। इस फरमान से कम्पनी को 3000 रुपया वार्षिक कर के बदले बंगालबिहार तथा उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने की अनुमति मिल गयी। राजकुमार शुजा की अनुमति से अंग्रेज़ों ने बंगाल में अपनी प्रथम कोठी 1651 ई. में हुगली में स्थापित की। ब्रिजमैन को 1651 ई. में हुगली में स्थापित अंग्रेज़ी फैक्ट्री का प्रधान नियुक्त किया गया गया। हुगली के बाद अंग्रेज़ों ने कासिम बाज़ारपटना और राजमहल में अपने कारखाने खोले। 1656 ई. में दूसरा फरमान मंजूर किया गया। इसी प्रकार कम्पनी ने 1672 ई. में शाइस्ता ख़ाँ से तथा 1680 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब से व्यापारिक रियायतों के संबंध में फरमान प्राप्त किया।

मुग़ल राजनीति में हस्तक्षेप

धीरे-धीरे अंग्रेज़ों का मुग़ल राजनीति में हस्तक्षेप प्रारम्भ हो गया। 1686 ई. में हुगली को लूटने के बाद अंग्रेज़ और मुग़ल सेनाओं में संघर्ष हुआ, जिसके परिणामस्वरूप कम्पनी को सूरतमसुलीपट्टमविशाखापत्तनम आदि के कारखानों से अपने अधिकार खोने पड़े, परन्तु अंग्रेज़ों द्वारा क्षमा याचना करने पर औरंगज़ेब ने उन्हें डेढ़ लाख रुपया मुआवजा देने के बदले पुनः व्यापार के अधिकार दे दिये और 1691 ई. में एक फरमान निकाला, जिसमें 3000 रुपये के निश्चित वार्षिक कर के बदले बंगाल में कमपनी को सीमा शुल्क देने से छूट दे दी गई। 1698 ई. में तत्कालीन बंगाल के सूबेदार अजीमुश्शान द्वारा कम्पनी ने तीन गांव- 1700 ई. तक गोविन्दपुर की ज़मींदारी 12000 रुपये भुगतान कर प्राप्त कर ली। 1700 ई. तक जॉब चारनाक ने इसे विकसित कर कलकत्ता का रूप दिया। इस प्रकार कलकत्ता में फ़ोर्ट विलियम की स्थापना हुई। इसका पहला गर्वनर चार्ल्स आयर को बनाया गया।
बंगाल में सूबेदार शाहशुजा के फरमान के बाद भी अंग्रेज़ों को बंगाल में बलात चुंगियाँ अदा करनी पड़ती थी, जिसके कारण कम्पनी ने अपनी सुरक्षा खुद करने के उद्देश्य से थाना के मुग़ल क़िलों पर अधिकार कर लिया। 1686 ई. में मुग़ल सेना ने अंग्रेज़ों को हुगली से पलायन करने एवं ज्वाग्रस्त फुल्टा द्वीप पर शरण लेने के लिए मजबूर किया। फ़रवरी, 1690 में एजेंट जॉब चारनाक को बादशाह औरंगज़ेब से क्षमा मांगनी पड़ी। बाद में कम्पनी को पुनः उसके अधिकार प्राप्त हो गए। लेकिन कम्पनी को क्षतिपूर्ति के लिए एक लाख पचास हज़ार रुपया हर्जाने के रूप में देना पड़ा।

फ़र्रुख़सियर का फरमान

1715 ई. में जॉन सर्मन के नेतृत्व में एक व्यापारिक मिशन तत्कालीन मुग़ल बादशाह फ़र्रुख़सियर से मिलने गया। इस व्यापारिक मिशन में एडवर्ड स्टीफ़ेंसन, विलियम हैमिल्टन (सर्जन) तथा ख़्वाजा सेहुर्द (अर्मेनियाई द्विभाषिया) शामिल थे। डॉक्टर विलियम हैमिल्टर, जिसने सम्राट फ़र्रुख़सियर को एक प्राण घातक फोड़े से निजात दिलाई थी, की सेवा से प्रसन्न होकर 1717 ई. में सम्राट फ़र्रुख़सियर ने 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' के लिए निम्नलिखित सुविधाओं वाला फरमान जारी किया-
  1. बंगाल में कम्पनी को 3000 रुपये वार्षिक देने पर निःशुल्क व्यापार का अधिकार मिल गया।
  2. कम्पनी को कलकत्ता के आस-पास की भूमि किराये पर लेने का अधिकार दिया गया।
  3. बम्बई की टकसाल से जारी किये गये सिक्कों को कम्पनी के द्वारा मुग़ल साम्राज्य में मान्यता प्रदान की गई।
  4. सूरत में 10,000 रुपये वार्षिक कर देने पर निःशुल्क व्यापार का अधिकार प्राप्त हो गया।
इतिहासकार ओम्र्स ने फर्रुखसियर द्वारा जारी किये गये इस फरमान को ‘कम्पनी का महाधिकार पत्र’ कहा। 1669 से 1677 तक बम्बई का गर्वनर गोराल्ड औंगियार ही वास्तव में बम्बई का महातम संस्थापक था। 1687 तक बम्बई पश्चिमी तट का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बना रहा। गोराल्ड औंगियार ने बम्बई में किलेबन्दी के साथ ही गोदी का निर्माण् कराया तथा बम्बई नगर की स्थापना और एक न्यायालय और पुलिस दल की स्थापना की। गोराल्ड औंगियार ने बम्बई के गर्वनर के रूप में यहां से तांबे और चांदी के सिक्के ढालने के लिए टकसाल की स्थापना की। औंगियार के समय में बम्बई की जनसंख्या 60,000 थी। उसका उत्तराधिकारी रौल्ट (1677-82) हुआ।

बंगाल पर अंग्रेज़ी अधिपत्य

मुग़ल साम्राज्य के अन्तर्गत आने वाले प्रान्तों में बंगाल सर्वाधिक सम्पन्न था। अंग्रेज़ों ने बंगाल में अपनी प्रथम कोठी 1651 ई. में हुगली में तत्कालीन बंगाल के सूबेदार शाहशुजा(शाहजहाँ के दूसरे पुत्र) की अनुमति से बनायी तथा बंगाल से शोरे, रेशम और चीनी का व्यापार आरम्भ किया। ये बंगाल के निर्यात की प्रमुख वस्तुऐं थी। उसी वर्ष एक राजवंश की स्त्री की डॉक्टर बौटन द्वारा चिकित्सा करने पर उसने अंग्रेज़ों को 3,000 रुपये वार्षिक में बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में मुक्त व्यापार की अनुमति प्रदान की। शीघ्र ही अंग्रेज़ों ने कासिम बाज़ार, पटना तथा अन्य स्थानों पर कोठियाँ बना लीं। 1658 में औरंगज़ेब ने मीर जुमला को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया। उसने अंग्रेज़ों के व्यापार पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया, परिणामस्वरूप 1658 से 1663 ई. तक अंग्रेज़ों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। किन्तु 1698 में सूबेदार अजीमुश्शान द्वारा अंग्रेज़ों को सूतानती, कालीघाट एवं गोविन्दपुर की जमींदारी दे दी गयी, जिससे अंग्रेज़ों को व्यापार करने में काफ़ी लाभ प्राप्त हुआ। 18वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर में यहाँ के सूबेदारों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर नवाब की उपाधि धारण की। मुर्शीदकुली ख़ाँ, जो औरंगज़ेब के समय में बंगाल का दीवान तथा मुर्शिदाबाद का फ़ौजदार था, बादशाह की मुत्यु के बाद 1717 में बंगाल का स्वतंत्र शासक बन गया। मुर्शीदकुली ख़ाँ ने बंगाल की राजधानी को ढाका से मुर्शिदाबाद हस्तांतरित कर दिया। उसके शासन काल में तीन विद्रोह हुए-
  1. सीताराम राय, उदय नारायण तथा ग़ुलाम मुहम्मद का विद्रोह।
  2. शुजात ख़ाँ का विद्रोह।
  3. नजात ख़ाँ का विद्रोह।
नजात ख़ाँ को हराने के बाद मुर्शीदकुली ख़ाँ ने उसकी ज़मींदारियों को अपने कृपापात्र रामजीवन को दे दिया। मुर्शीदकुली ख़ाँ ने नए सिरे से बंगाल के वित्तीय मामले का प्रबन्ध किया। उसने नए भूराजस्व बन्दोबस्त के जरिए जागीर भूमि के एक बड़े भाग को 'खालसा भूमि' बना दिया तथा 'इजारा व्यवस्था' (ठेके पर भूराजस्व वसूल करने की व्यवस्था) आरम्भ की। 1732 ई. में बंगाल के नवाब द्वारा अलीवर्दी ख़ाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया गया। 1740 ई. में अलीवर्दी ख़ाँ ने बंगाल के नवाब शुजाउद्दीन के पुत्र सरफ़राजको 'घेरिया के युद्ध' में परास्त कर बंगाल की सूबेदारी प्राप्त कर ली ओर वह अब बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सम्मिलित प्रदेश का नवाब बन गया। यही नहीं, इसने तत्कालीन मुग़ल सम्राट मुहम्मदशाह से 2 करोड़ रुपये नजराने के बदलें में स्वीकृति भी प्राप्त कर लिया। उसने लगभग 15 वर्ष तक मराठों से संघर्ष किया। अलीवर्दी ख़ाँ ने यूरोपियों की तुलना मधुमक्खियों से करते हुए कहा कि "यदि उन्हें छेड़ा न जाय तो वे शहद देंगी और यदि छेड़ा जाय तो काट-काट कर मार डालेंगी।"
1756 ई. में अलीवर्दी ख़ाँ के मरने के बाद उसके पौत्र सिराजुद्दौला ने गद्दी को ग्रहण किया। पूर्णिया का नवाब शौकतजंग (सिराजुद्दौला की मौसी का लडका) तथा घसीटी बेगम(सिराजुद्दौला की मौसी), दोनों ही सिराजुद्दौला के प्रबल विरोधी थे। उसका सबसे प्रबल शत्रु बंगाल की सेना का सेनानायक और अलीवर्दी ख़ाँ का बहनाई मीर जाफ़र अली था। दूसरी ओर, चूंकि अंग्रेज़, फ़्राँसीसियों से भयभीत थे, अतः उन्होंने कलकत्ता की फ़ोर्ट विलियम कोठी की क़िलेबन्दी कर डाली। अंग्रेज़ों ने शौकत जंग एवं घसीटी बेगम का समर्थन किया। अंग्रेज़ों के इस कार्य से रुष्ट होकर सिराजुद्दौला ने 15 जून, 1756 को फ़ोर्ट विलियम का घेराव कर अंग्रेज़ों को आत्म-समर्पण के लिए मजबूर कर दिया। अन्ततः नवाब ने कलकत्ता मानिकचन्द्र को सौंप दिया और स्वयं मुर्शिदाबाद वापस आ गया।
प्रमुख यूरोपीय कम्पनी
कंपनीस्थापना वर्ष
पुर्तग़ाली ईस्ट इण्डिया कंपनी ('इस्तादो द इण्डिया')1498 ई.
अंग्रेज़ी ईस्ट इण्डिया कम्पनी ('द गर्वनर एण्ड कम्पनी ऑफ़ मर्चण्ट्स ऑफ़ लंदन ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इंडीज')1600 ई.
डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी ('वेरीगंडे ओस्त इण्डिशें कंपनी')1602 ई.
डैनिश ईस्ट इण्डिया कंपनी1616 ई.
फ़्राँसीसी ईस्ट इण्डिया कंपनी ('कंपनी इण्डेस ओरियंतलेस')1664 ई.
स्वीडिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी1731 ई.

कालकोठरी की घटना

Seealso.jpg इन्हें भी देखेंकलकत्ता की काल कोठरी
ऐसा माना जाता है कि बंगाल के नवाब ने 146 अंग्रेज़ बंदियों, जिनमें स्त्रियाँ और बच्चे भी सम्मिलित थे, को एक छोटे-से कमरे में बन्द कर दिया था। 20 जून, 1756 की रात को बंद करने के बाद जब 23 जूनको प्रातः कोठरी को खोला गया तो उसमें 23 लोग ही जीवित पाये गये। जीवित रहने वालों में हॉलवैल भी था, जिसे इस घटना का रचयिता माना जाता है। इस घटना की विश्वसनीयता को इतिहासकारों ने संदिग्ध माना है और इतिहास में इस घटना का महत्व केवल इतना ही है कि अंग्रेज़ों ने इस घटना को आगे के आक्रामक युद्ध का कारण बनाये रखा।

प्लासी युद्ध की बुनियाद

इस प्रकार से कलकत्ता का पतन प्लासी युद्ध की पूर्व पीठिका माना जाता है। अंग्रेज़ अधिकारियों ने मद्राससे अपनी उस सेना को रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में कलकत्ता भेजा, जिसका गठन फ़्राँसीसियों से मुकाबलें के लिए किया गया था। इस सैन्य अभियान में एडमिरल वाटसन, क्लाइव का सहायक था। अंग्रज़ों द्वारा 2 जनवरी, 1757 को कलकत्ता पर अधिकार करने के बाद उन्होंने नवाब के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषण कर दी, परिणास्वरूप नवाब को क्लाइव के साथ 9 जनवरी, 1757 को 'अलीनगर की संधि' (नवाब द्वारा कलकत्ता को दिया गया नाम) करनी पड़ी। संधि के अनुसार नवाब ने अंग्रेज़ों को वह अधिकार पुनः प्रदान किया, जो उन्हें सम्राट फ़र्रुख़सियर के फरमान द्वारा मिला हुआ था और इसके साथ ही तीन लाख रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में दिया गया। अब रॉबर्ट क्लाइव ने कूटनीति के सहारे नवाब के उन अधिकारियों को अपनी ओर मिलाना चाहा, जो नवाब से असंतुष्ट थे। अपनी इस योजना के अन्तर्गत क्लाइव ने सेनापति मीर जाफर, साहूकार जगत सेठ, मानिक चन्द्र, कलकत्ता का व्यापारी राय दुलर्भ तथा अमीन चन्द्र से एक षडयंत्र कर सिराजुद्दौला को हटाने का प्रयत्न किया। इसी बीच मार्च, 1757 में अंग्रज़ों ने फ़्राँसीसियों से चन्द्रनगर के जीत लिया। अंग्रेज़ों के इन समस्त कृत्यों से नवाब का क्रोध सीमा से बाहर हो गया, जिसकी अन्तिम परिणति प्लासी के युद्ध में रूप में हुई।

डेन

डेनमार्क की 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' की स्थापना 1616 में हुई थी। इस कम्पनी ने 1620 में त्रैंकोवार (तमिलनाडु) तथा 1667 ई. में सेरामपुर (बंगाल) में अपनी व्यापारिक कंपनियाँ स्थापित कर लीं। सेरामपुर डेनों का एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। 1854 में डेन लोगों ने अपनी वाणिज्य कंपनी को अंग्रेज़ों को बेच दिया।

आधुनिक भारत उत्तरकालीन मुग़ल सम्राट

इतिहास : उत्तरकालीन मुगल सम्राट क्रमानुसार
(TRICK)
आधुनिक भारत के इतिहास में जो प्रमुख 9
उत्तरकालीन मुग़ल सम्राट है उनको क्रमानुसार याद
रखने के लिए आपके लिए TRICK बनाई गई है।
TRICK-"बजाओ FM को अहमद आलम SAHAB(साहब)"
Note : इस ट्रिक में उत्तरकालीन मुगल सम्राट के
नाम क्रमानुसार है।
ट्रिक का विस्तृत्व रूप :
बजाओ = ब+जाओ
1. ब-बहादुरशाह (1707-1712 ई.)
2. जाओ-जहाँदार शाह (1712-1713 ई.)
FM = F+M
3. F-फर्रुखसियर (1713-1719 ई.)
4. M-मुहम्मदशाह (1719-1748 ई.)
को-silent
अहमद आलम = अहमद+आलम
5. अहमद-अहमदशाह (1748-1754 ई.)
6. आलम-आलमगीर-II (1754-1759 ई.)
SAHAB = SAH+A+B
7. SAH-शाहआलम-II (1759-1806 ई.)
8. A-अकबर-II (1806-1837 ई.)
9. B-बहादुरशाह जफ़र (1837-1857 ई.)

मराठो का उत्कर्ष

मराठा लोगों को 'महरट्टा' या 'महरट्टी' भी कहा जाता है। भारत के वे प्रमुख लोग, जो इतिहास में 'क्षेत्र रक्षक योद्धा' और हिन्दू धर्म के समर्थक के रूप में विख्यात हैं, इनका गृहक्षेत्र आज का मराठी भाषी क्षेत्र महाराष्ट्र राज्य है, जिसका पश्चिमी क्षेत्र समुद्र तट के किनारे मुंबई (भूतपूर्व बंबई) से गोवा तक और आंतरिक क्षेत्र पूर्व में लगभग 160 किमी. नागपुर तक फैला हुआ था। मराठा शब्द का तीन मिलते-जुलते अर्थों में उपयोग होता है-मराठी भाषी क्षेत्र में इससे एकमात्र प्रभुत्वशाली मराठा जाति, या मराठों और कुंभी जाति के एक समूह का बोध होता है। महाराष्ट्र के बाहर मोटे तौर पर इससे समूची क्षेत्रीय मराठी भाषी आबादी का बोध होता है, जिसकी संख्या लगभग 6.5 करोड़ है।

इतिहास

शिवाजी के प्रतिनिधित्व में मराठा शक्ति के उत्थान को मध्यकालीन भारत के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में माना जाता है। मराठों के उत्कर्ष के कारणों में महत्त्वपूर्ण कारण था- ‘महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति।’ चूँकि यह प्रदेश अधिकांशतः पहाड़ों, नदियों, जंगलों एवं अनुपजाऊ भूमि वाला क्षेत्र था, इसलिए यहाँ के लोग जुझारू व्यक्तित्व के धनी थे। दूसरा कारण, पहाड़ी प्रदेश के निवासी होने के कारण मराठे स्वस्थ एवं बलिष्ठ होते थे। तीसरे, चूँकि मराठे पहाड़ी क्षेत्रों में रहते थे, इसलिए ये छापामार युद्ध शैली (गोरिल्ला युद्ध) में काफ़ी निपुण थे।

कुल और वंश

ऐतिहासिक रूप में मराठा शब्द शिवाजी द्वारा 17वीं शताब्दी में स्थापित राज्य और उनके उत्तराधिकारियों द्वारा 18वीं शताब्दी में विस्तारित क्षेत्रीय राज्य के लिए प्रयुक्त होता है। मराठा जाति के लोग मुख्यतः ग्रामीण किसान, ज़मींदार और सैनिक थे। कुछ मराठों और कुंभियों ने कभी-कभी क्षत्रिय होने का दावा भी किया, और इसकी पुष्टि वे अपने कुल-नाम व वंशावली को महाकाव्यों के नायकों, उत्तर के राजपूत वंशों या पूर्व मध्यकाल के ऐतिहासिक राजवंशों से जोड़कर करते हैं। मराठा और कुंभी समूह की जातियाँ तटीय, पश्चिमी पहाड़ियों और दक्कन के मैदान के उपसमूहों में बँटी हुई हैं, और उनके बीच आपस में वैवाहिक संबंध कम ही होते हैं। प्रत्येक उप क्षेत्र में इन जातियों के गोत्रों को विभिन्न समाज मंडलों में क्रमशः घटते हुए क्रम में वर्गीकृत किया गया है। सबसे बड़े सामाजिक मंडल में 96 गोत्र शामिल हैं। जिनमें सभी असली मराठा बताए जाते हैं। लेकिन इन 96 गोत्रों की सूचियों में काफ़ी विविधता और विवाद हैं।


16वीं एवं 17वीं शताब्दी में

 भारत में हुए धार्मिक आन्दोलनों ने महाराष्ट्र में तुकाराम, रामदास, वामन पंडित एवं एकनाथ जैसे धर्म सुधारकों को जन्म दिया। इन सबके उपदेशों ने मराठों को एकता के सूत्र में बांधने एवं देशभक्ति की भावना जगाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन धर्मोंपदेश द्वारा महाराष्ट्र की भाषा 'मराठी' को अपने उपदेशों का माध्यम बनाने के कारण मराठी साहित्य का विकास हुआ। भाषा एवं साहित्य के विकास ने भी मराठों के उत्कर्ष में भूमिका निभायी।

धर्म सुधारकों का योगदान

उच्च पद प्राप्ति

दक्षिणी के मुस्लिम राज्यों के राजस्व विभाग में कार्यरत मराठों को शासन कला एवं युद्ध कला की शिक्षा उन्हीं राज्यों से मिली थी। शाहजी भोंसले, मुशरराव, मदनपंडित और राजराय परिवार के सदस्यों ने इन मुस्लिम राज्यों में सूबेदार, मंत्री दीवान आदि अनेक महत्त्वपूर्ण पदों को धारण किया था। गोलकुण्डाबीदर और बीजापुर के नाममात्र के मुसलमान शासक अपने सैनिक एवं असैनिक दोनों विभाग की कुशलता के मराठों पर निर्भर थे। इस प्रकार मराठा शक्ति के उत्कर्ष में दक्षिणी राज्यों की भूमिका निर्विवाद है।

शिवाजी की प्रेरणा

औरंगज़ेब की हिन्दू विरोधी नीति का ही परिणाम था कि, शिवाजी ने 'हिन्दू पद पादशाही' एवं 'हिन्दुत्व धमोद्धारक' की उपाधि ग्रहण कर पुनः ब्राह्मणों की रक्षा का प्रण किया, जो मराठा उत्कर्ष का एक कारण रहा। इन सब कारणों के साथ मराठों के उत्थान में शिवाजी की भूमिका एवं उनके चमत्कारी व्यक्तित्व को भुलाया नहीं जा सकता। शिवाजी ने अणु के कणों की तरह फैले हुए मराठों को अपने कुशल नेतृत्व एवं राष्ट्रीयता के संदेशों के माध्यम से एकता के सूत्र में बाँधा और इसके साथ ही मराठों की उस शक्ति का जगाया, जो उनके अन्दर वर्षों से छिपी थी।

मुग़ल काल

मुग़ल और अफ़ग़ान (1525-1556)

पन्द्रहवीं शताब्दी में मध्य और पश्चिम एशिया में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। चौदहवीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य के विघटन के पश्चात् तैमूर ने ईरान और तूरान को फिर से एक शासन के अंतर्गत संगठित किया। तैमूर का साम्राज्य वोल्गा नदी के निचले हिस्से से सिन्धु नदी तक फैला हुआ था और उसमें एशिया का माइनर (आधुनिक तुर्की), ईरान, ट्रांस-आक्सियाना, अफ़ग़ानिस्तान और पंजाब का एक भाग था। 1404 में तैमूर की मृत्यु हो गई। लेकिन उसके पोते शाहरूख मिर्ज़ा ने साम्राज्य का अधिकांश भाग संगठित रखा। उसके समय में समरकन्द और हिरात पश्चिम एशिया के सांस्कृतिक केन्द्र बन गए। प्रत्येक समरकन्द के शासक का इस्लामी दुनिया में काफ़ी सम्मान था।

तैमूर

पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देशों का सम्मान तेज़ी से कम हुआ। इसका कारण तैमूर के साम्राज्य को विभाजित करने की परम्परा थी। अनेक तैमूर रियासतें, जो इस प्रक्रिया में बनी, आपस में लड़ती-झगड़ती रहीं। इससे नये तत्वों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिला। उत्तर से एक मंगोल जाति उज़बेक ने ट्रांस-आक्सीयाना में अपने क़दम बढ़ाये। उज़बेकों ने इस्लाम अपना लिया था। लेकिन तैमूरी उन्हें असंस्कृत बर्बर ही समझते थे। और पश्चिम की ओर ईरान में सफ़वीं वंश का उदय हुआ। सफ़वी सन्तों की परम्परा में पनपे थे। जो स्वयं को पैग़म्बर के वंशज मानते थे। वे मुसलमानों के शिया मत का समर्थन करते थे और उन्हें परेशान करते थे जो शिया सिद्धांतों को अस्वीकार करते थे। दूसरी ओर उज़बेक सुन्नी थे। इसलिए उन दोनों तत्वों के बीच संघर्ष साम्प्रदायिक मतभेद के कारण और भी बढ़ गया। ईरान के भी पश्चिम में आटोमन तुर्कों की शक्ति उभर रही थी। जो पूर्वी यूरोप तथा ईराक और ईरान पर अधिपत्य ज़माना चाहते थे। इस प्रकार सोलहवीं शताब्दी में एशिया में तीन बड़ी साम्राज्य शक्तियों के बीच संघर्ष की भूमिका तैयार हो गई।

बाबर

1494 में ट्रांस-आक्सीयाना की एक छोटी सी रियासत फ़रग़ना का बाबर उत्तराधिकारी बना। उज़बेक ख़तरे से बेख़बर होकर तैमूर राजकुमार आपस में लड़ रहे थे। बाबर ने भी अपने चाचा से समरकन्द छीनना चाहा। उसने दो बार उस शहर को फ़तह किया, लेकिन दोनों ही बार उसे जल्दी ही छोड़ना पड़ा। दूसरी बार उज़बेक शासक शैबानी ख़ान को समरकन्द से बाबर को खदेड़ने के लिए आमंत्रित किया गया था। उसने बाबर को हराकर समरकन्दर पर अपना झंडा फहरा दिया। उसके बाद जल्दी ही उसने उस क्षेत्र में तैमूर साम्राज्य के भागों को भी जीत लिया। इससे बाबर को क़ाबुलकी ओर बढ़ना पड़ा और उसने 1504 में उस पर अधिकार कर लिया। उसके बाद चौदह वर्ष तक वह इस अवसर की तलाश में रहा कि फिर उज़बेकों को हराकर अपनी मातृभूमि पर पुनः अधिकार कर सके। उसने अपने चाचा, हिरात के शासक को अपनी ओर मिलाना चाहा, लेकिन इस कार्य में वह सफल नहीं हुआ। शैबानी ख़ान ने अंततः हिरात पर भी अधिकार कर लिया। इससे सफ़वीयों से उसका सीधा संघर्ष उत्पन्न हो गया। क्योंकि वे भी हिरात और उसके आस-पास के क्षेत्र को अपना कहते थे। इस प्रदेश को तत्कालीन लेखकों ने ख़ुरासान कहा है। 1510 की प्रसिद्ध लड़ाई में ईरान के शाह इस्माइल ने शैबानी को हराकर मार डाला। इसी समय बाबर ने समरकन्द जीतने का एक प्रयत्न और किया। इस बार उसने ईरानी सेना की सहायता ली। वह समरकन्द पहुंच गया। लेकिन जल्दी ही ईरानी सेनापतियों के व्यवहार के कारण रोष से भर गया। वे उसे ईरानी साम्राज्य का एक गवर्नर ही मानते थे। स्वतंत्र शासक नहीं। इसी बीच उज़बेक भी अपनी हार से उभर गये। बाबर को एक बार फिर समरकन्द से खदेड़ दिया गया और उसे क़ाबुल लौटना पड़ा। स्वयं शाह ईरान इस्माइल को भी आटोहान-साम्राज्य के साथ हुई प्रसिद्ध लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार उज़बेक ट्रांस-आक्सीयाना के निर्विरोध स्वामी हो गए। इन घटनाऔं के कारण ही अन्ततः बाबर ने भारत की ओर रूख किया।

दिल्ली विजय

बाबर ने लिखा है कि क़ाबुल जीतने (1504) से लेकर पानीपत की लड़ाई तक उसने हिन्दुस्तान जीतने का विचार कभी नहीं त्यागा। लेकिन उसे भारत विजय के लिए कभी सही अवसर नहीं मिला था। "कभी अपने बेगों के भय के कारण, कभी मेरे और भाइयों के बीच मतभेद के कारण।" मध्य एशिया के कई अन्य आक्रमणकारियों की भांति बाबर भी भारत की अपार धन-राशि के कारण इसकी ओर आकर्षित हुआ था। भारत सोने की क़ान था। बाबर का पूर्वज तैमूर यहाँ से अपार धन-दौलत और बड़ी संख्या में कुशल शिल्पी ही नहीं ले गया था, जिन्होंने बाद में उसके एशिया साम्राज्य को सुदृढ़ करने और उसकी राजधानी को सुन्दर बनाने में योगदान दिया, बल्कि पंजाब के एक भाग को अपने कब्जे में कर लिया था। ये भाग अनेक पीढ़ियों तक तैमूर के वंशजों के अधीन रहे थे। जब बाबर ने अफ़ग़ानिस्तान पर विजय प्राप्त की तो उसे लगा कि इन दोनों पर भी उसका क़ानूनी अधिकार है।
क़ाबुल की सीमित आय भी पंजाब परगना को विजित करने का एक कारण थी। "उसका (बाबर) राज्य बदखशां, कंधारऔर क़ाबुल पर था। जिनसे सेना की अनिवार्यताएं पूरी करने के लिए भी आय नहीं होती थी। वास्तव में कुछ सीमा प्रान्तों पर सेना बनाए रखने में और प्रशासन के काम में व्यय आमदनी से ज़्यादा था।"
सीमित आय साधनों के कारण बाबर अपने बेगों और परिवार वालों के लिए अधिक चीज़ें उपलब्ध नहीं कर सकता था। उसे क़ाबुल पर उज़बेक आक्रमण का भी भय था। वह भारत को बढ़िया शरण-स्थल समझता था। उसकी दृष्टि में उज़बेकों के विरुद्ध अभियानों के लिए भी यह अच्छा स्थल था

लोदी

उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीतिक स्थिति ने बाबर को भारत आने का अवसर प्रदान किया। 1517 में सिकन्दर लोदी की मृत्यु हो गई थी और इब्राहीम लोदी गद्दी पर बैठा था। एक केन्द्राभिमुखी बड़ा साम्राज्य स्थापित करने के इब्राहिम के प्रयत्नों ने अफ़ग़ानों और राजपूतों दोनों को सावधान कर दिया था। अफ़ग़ान सरदारों में सर्वाधिक शक्तिशाली सरदार दौलत ख़ाँ लोदी था। जो पंजाब का गवर्नर था। पर वास्तव में लगभग स्वतंत्र था। दौलत ख़ाँ ने अपने बेटे को इब्राहिम लोदी के दरबार में उपहार देखकर उसे मनाने का प्रयत्न किया। साथ ही साथ वह भीरा का सीमान्त प्रदेश जीतकर अपनी स्थिति को भी मज़बूत बनाना चाहता था। 1518-19 में बाबर ने भीरा के शक्तिशाली क़िले को जीत लिया। फिर उसने दौलत ख़ाँ और इब्राहिम लोदी को पत्र और मौखिक संदेश भेजकर यह मांग की कि जो प्रदेश तुर्कों के हैं, वे उसे लौटा दिए जाएं। लेकिन दौलत ख़ाँ ने बाबर के दूत को लाहौर में अटका लिया। वह न स्वयं उससे मिला और न उसे इब्राहिम लोदी के पास जाने दिया। जब बाबर क़ाबुल लौट गया, तो दौलत ख़ाँ ने भीरा से उसके प्रतिनिधियों को निकाल बाहर किया।

कन्धार में विद्रोह

1520-21 में बाबर ने एक बार फिर सिंधु नदी पार की और आसानी से भीरा और सियालकोट पर क़ब्ज़ा कर लिया। ये भारत के लिए मुग़ल द्वार थे। लाहौर भी पदाक्रांत हो गया। वह सम्भवतः और आगे बढ़ता, लेकिन तभी उसे कन्धार में विद्रोह का समाचार मिला। वह उल्टे पांव लौट गया और डेढ़ साल के घेरे के बाद कन्धार को जीत लिया। उधर से निश्चिंत होकर बाबर की निगाहें फिर भारत की ओर उठीं। इसी समय के लगभग बाबर के पास दौलत ख़ाँ लोदी के पुत्र दिलावर ख़ाँ के नेतृत्व में दूत पहुंचे। उन्होंने बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया और कहा कि चूंकि इब्राहिम लोदी अत्याचारी है और उसके सरदारों का समर्थन अब उसे प्राप्त नहीं है, इसलिए उसे अपदस्थ करके बाबर राजा बने। इस बात की सम्भावना है कि राणा सांगा का दूत भी इसी समय उसके पास पहुंचा। इन दूतों के पहुंचने पर बाबर को लगा कि यदि हिन्दुस्तान को नहीं, तो सारे पंजाब को जीतने का समय आ गया है। 1525 में जब बाबर पेशावर में था, उसे ख़बर मिली कि दौलतख़ाँ लोदी ने फिर से अपना पाला बदल लिया है। उसने 30,000-40,000 सिपाहियों को इकट्ठा कर लिया था और बाबर की सेनाओं को स्यालकोट से खदेड़ने के बाद लाहौर की ओर बढ़ रहा था। बाबर से सामना होने पर दौलत ख़ाँ लोदी की सेना बिखर गई। दौलत ख़ाँ ने आत्मसमर्पण कर दिया और बाबर ने उसे माफ़ी दे दी। इस प्रकार सिंधु नदी पार करने के तीन सप्ताह के भीतर ही पंजाब पर बाबर का क़ब्ज़ा हो गया।

पानीपत की लड़ाई

21 अप्रैल, 1526
दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ संघर्ष अवश्यम्भावी था। बाबर इसके लिए तैयार था और उसने दिल्ली की ओर बढ़ना शृरू किया। इब्राहिम लोदी ने पानीपत में एक लाख सैनिकों को और एक हज़ार हाथियों को लेकर बाबर का सामना किया। क्योंकि हिन्दुस्तानी सेनाओं में एक बड़ी संख्या सेवकों की होती थी, इब्राहिम की सेना में लड़ने वाले सिपाही कहीं कम रहे होंगे। बाबर ने सिंधु को जब पार किया था तो उसके साथ 12000 सैनिक थे, परन्तु उसके साथ वे सरदार और सैनिक भी थे जो पंजाब में उसके साथ मिल गये थे। इस प्रकार उसके सिपाहियों की संख्या बहुत अधिक हो गई थी। फिर भी बाबर की सेना संख्या की दृष्टि से कम थी। बाबर ने अपनी सेना के एक अंश को शहर में टिका दिया जहां काफ़ी मकान थे, फिर दूसरे अंश की सुरक्षा उसने खाई खोद कर उस पर पेड़ों की डालियां डाल दी। सामने उसने गाड़ियों की कतार खड़ी करके सुरक्षात्मक दीवार बना ली। इस प्रकार उसने अपनी स्थिति काफ़ी मज़बूत कर ली। दो गाड़ियों के बीच उसने ऎसी संरचना बनवायी, जिस पर सिपाही अपनी तोपें रखकर गोले चला सकत थे। बाबर इस विधि को आटोमन (रूमी) विधि कहता था। क्योंकि इसका प्रयोग आटोमनों ने ईरान के शाह इस्माईल के विरुद्ध हुई प्रसिद्ध लड़ाई में किया था। बाबर ने दो अच्छे निशानेबाज़ तोपचियों उस्ताद अली और मुस्तफ़ा की सेवाएं भी प्राप्त कर ली थीं। भारत में बारूद का प्रयोग धीरे-धीरे होना शुरू हुआ। बाबर कहता है कि इसका प्रयोग सबसे पहले उसने भीरा के क़िले पर आक्रमण के समय किया था। ऎसा अनुमान है कि बारूद से भारतीयों का परिचय तो था, लेकिन प्रयोग बाबर के आक्रमण के साथ ही आरम्भ हुआ।

इब्राहिम लोदी की कमज़ोरी

बाबर की सुदृढ़ रक्षा-पंक्ति का इब्राहिम लोदी को कोई आभास नहीं था। उसने सोचा कि अन्य मध्य एशियायी लड़ाकों की तरह बाबर भी दौड़-भाग कर युद्ध लड़ेगा और आवश्यकतानुसार तेज़ी से आगे बढ़ेगा या पीछे हटेगा। सात या आठ दिन तक छुट-पुट झड़पों के बाद इब्राहिम लोदी की सेना अन्तिम युद्ध के लिए मैदान में आ गई। बाबर की शक्ति देखकर लोदी के सैनिक हिचके इब्राहिम लोदी अभी अपनी सेना को फिर से संगठित कर ही रहा था कि बाबर की सेना के आगे वाले दोनों अंगों ने चक्कर लगा कर उसकी सेना पर पीछे और आगे से आक्रमण कर दिया। सामने की ओर बाबर के तोपचियों ने अच्छी निशानेबाज़ी की लेकिन बाबर अपनी विजय का अधिकांश श्रेय अपने तीर अन्दाज़ों को देता है। यह आश्चर्य की बात है कि वह इब्राहिम के हाथियों का उल्लेख नहीं के बराबर करता है। यह स्पष्ट है कि इब्राहिम को उनके इस्तेमाल का समय ही नहीं मिला।

लोदियों की हार

प्रारम्भिक धक्कों के बावजूद इब्राहिम की सेना वीरता से लड़ी। दो या तीन घंटों तक युद्ध होता रहा। इब्राहिम 5000-6000 हज़ार सैनिकों के साथ अन्त तक लड़ता रहा। अनुमान है कि इब्राहिम के अतिरिक्त उसके 15000 से अधिक सैनिक इस लड़ाई में मारे गये।{संदर्भ ?} पानीपत की लड़ाई भारतीय इतिहास में एक निर्णायक लड़ाई मानी जाती है। इसमें लोदियों की कमर टूट गई और दिल्ली और आगरा का सारा प्रदेश बाबर के अधीन हो गया। इब्राहिम लोदी द्वारा आगरा में एकत्र ख़ज़ाने से बाबर की आर्थिक कठिनाइयां दूर हो गई। जौनपुर तक का समृद्ध क्षेत्र भी बाबर के सामने खुला था। लेकिन इससे पहले की बाबर इस पर अपना अधिकार सुदृढ़ कर सके उसे दो कड़ी लड़ाइयां लड़नी पड़ी, एक मेवाड़ के विरुद्ध दूसरी पूर्वी अफ़ग़ानों के विरुद्ध। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो पानीपत की लड़ाई राजनीतिक क्षेत्र में इतनी निर्णायक नहीं थी जितनी की समझी जाती है। इसका वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि इसने उत्तर भारत पर आधिपत्य के लिए संघर्ष का एक नया युग प्रारम्भ किया।
पानीपत की लड़ाई में विजय के बाद बाबर के सामने बहुत सी कठिनाइयाँ आईं। उसके बहुत से बेग भारत में लम्बे अभियान के लिये तैयार नहीं थे। गर्मी का मौसम आते ही उनके संदेह बढ़ गये। वे अपने घरों से दूर तक अनजाने और शत्रु देश में थे। बाबर कहता है कि भारत के लोगों ने 'अच्छी शत्रुता' निभाई, उन्होंने मुग़ल सेनाओं के आने पर गांव ख़ाली कर दिए। निःसन्देह तैमूर द्वारा नगरों और गांवों की लूटपाट और क़त्लेआम उनकी याद में ताज़ा थे।
बाबर यह बात जानता था कि भारतीय साधन ही उसे एक दृढ़ साम्राज्य बनाने में मदद दे सकते हैं और उसके बेगों को भी संतुष्ट कर सकते हैं। "क़ाबुल की ग़रीबी हमारे लिए फिर नहीं" वह अपनी डायरी में लिखता है। इसलिए उसने दृढ़ता से काम लिया, और भारत में रहने की अपनी इच्छा ज़ाहिर कर दी और उन बेगों को छुट्टी दे दी जो क़ाबुल लौटना चाहते थे। इससे उसका रास्ता साफ़ हो गया। लेकिन इससे राणा साँगा से भी उसकी शत्रुता हो गयी, जिसने उससे दो-दो हाथ करने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं।

खानवा की लड़ाई

पूर्वी राजस्थान और मालवा पर आधिपत्य के लिए राणा साँगा और इब्राहिम लोदी के बीच बढ़ते संघर्ष का संकेत पहले ही किया जा चुका है। मालवा के महमूद ख़िल्जी को हराने के बाद राणा साँगा प्रभाव आगरा के निकट एक छोटी-सी नदी पीलिया ख़ार तक धीरे-धीरे बढ़ गया था। सिंधु-गंगा घाटी में बाबर द्वारा साम्राज्य की स्थापना से राणा साँगा को ख़तरा बढ़ गया। साँगा ने बाबर को भारत से खदेड़ने, कम-से-कम उसे पंजाब तक सीमित रखने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं।

राणा साँगा और बाबर

बाबर ने राणा साँगा पर संधि तोड़ने का दोष लगाया। वह कहता है कि राणा साँगा ने मुझे हिन्दुस्तान आने का न्योता दिया और इब्राहिम लोदी के ख़िलाफ़ मेरा साथ देने का वायदा किया, लेकिन जब मैं दिल्ली और आगरा फ़तह कर रहा था, तो उसने पांव भी नहीं हिलाये। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि राणा साँगा ने बाबर के साथ क्या समझौता किया था। हो सकता है कि उसने एक लम्बी लड़ाई और कल्पना की हो और सोचा हो कि तब तक वह स्वयं उन प्रदेशों पर अधिकार कर सकेगा जिन पर उसकी निगाह थी या, शायद उसने यह सोचा हो कि दिल्ली को रौंद कर लोदियों की शक्ति को क्षीण करके बाबर भी तैमूर की भाँति लौट जायेगा। बाबर के भारत में ही रुकने के निर्णय ने परिस्थिति को पूरी तरह से बदल दिया।
इब्राहिम लोदी के छोटे भाई महमूद लोदी सहित अनेक अफ़ग़ानों ने यह सोच कर राणा साँगा का साथ दिया कि अगर वह जीत गया, तो शायद उन्हें दिल्ली की गद्दी वापस मिल जायेगी। मेवात के शासक हसन ख़ाँ मेवाती ने भी राणा साँगा का पक्ष लिया। लगभग सभी बड़ी राजपूत रियासतों ने राणा की सेवा में अपनी-अपनी सेनाएँ भेजीं।

जिहाद का नारा

राणा साँगा की प्रसिद्धि और बयाना जैसी बाहरी मुग़ल छावनियों पर उसकी प्रारम्भिक सफलताओं से बाबर के सिपाहियों का मनोबल गिर गया। उनमें फिर से साहस भरने के लिए बाबर ने राणा साँगा के ख़िलाफ़ 'जिहाद' का नारा दिया। लड़ाई से पहले की शाम उसने अपने आप को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए शराब के घड़े उलट दिए और सुराहियाँ फोड़ दी। उसने अपने राज्य में शराब की ख़रीदफ़रोख़्त पर रोक लगा दी और मुसलमानों पर से सीमा कर हटा दिया।
बाबर ने बहुत ध्यान से रणस्थली का चुनाव किया और वह आगरा से चालीस किलोमीटर दूर खानवा पहुँच गया। पानीपत की तरह ही उसने बाहरी पंक्ति में गाड़ियाँ लगवा कर और उसके साथ खाई खोद कर दुहरी सुरक्षा की पद्धति अपनाई। इन तीन पहियों वाली गाड़ियों की पंक्ति में बीच-बीच में बन्दूक़चियों के आगे बढ़ने और गोलियाँ चलाने के लिए स्थान छोड़ दिया गया।

राणा साँगा की पराजय

खानवा की लड़ाई (1527) में ज़बर्दस्त संघर्ष हुआ। बाबर के अनुसार साँगा की सेना में 200,000 से भी अधिक सैनिक थे। इनमें 10,000 अफ़ग़ान घुड़सवार और इतनी संख्या में हसन ख़ान मेवाती के सिपाही थे। यह संख्या भी, और स्थानों की भाँति बढ़ा-बढ़ा कर कही गई हो सकती है, लेकिन बाबर की सेना निःसन्देह छोटी थी। साँगा ने बाबर की दाहिनी सेना पर ज़बर्दस्त आक्रमण किया और उसे लगभग भेद दिया। लेकिन बाबर के तोपख़ाने ने काफ़ी सैनिक मार गिराये और साँगा को खदेड़ दिया गया। इसी अवसर पर बाबर ने केन्द्र-स्थित सैनिकों से, जो गाड़ियों के पीछे छिपे हुए थे, आक्रमण करने के लिए कहा। ज़जीरों से गाड़ियों से बंधे तोपख़ाने को भी आगे बढ़ाया गया। इस प्रकार साँगा की सेना बीच में घिर गई और बहुत से सैनिक मारे गये। साँगा की पराजय हुई। राणा साँगा बच कर भाग निकला ताकि बाबर के साथ फिर संघर्ष कर सके परन्तु उसके सामन्तों ने ही उसे ज़हर दे दिया जो इस मार्ग को ख़तरनाक और आत्महत्या के समान समझते थे। इस प्रकार राजस्थान का सबसे बड़ा योद्धा अन्त को प्राप्त हुआ। साँगा की मृत्यु के साथ ही आगरा तक विस्तृत संयुक्त राजस्थान के स्वप्न को बहुत धक्का पहुँचा।
खानवा की लड़ाई से दिल्ली-आगरा में बाबर की स्थिति सुदृढ़ हो गई। आगरा के पूर्व में ग्वालियर और धौलपुर जैसे क़िलों की शृंखला जीत कर बाबर ने अपनी स्थिति और भी मज़बूत कर ली। उसने हसन ख़ाँ मेवाती से अलवर का बहुत बड़ा भाग भी छीन लिया। फिर उसने मालवा-स्थित चन्देरी के मेदिनी राय के विरुद्ध अभियान छेड़ा। राजपूत सैनिकों द्वारा रक्त की अंतिम बूँद तक लड़कर जौहर करने के बाद चन्देरी पर बाबर का राज्य हो गया। बाबर को इस क्षेत्र में अपने अभियान को सीमित करना पड़ा क्योंकि उसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में अफ़ग़ानों की हलचल की ख़बर मिली।